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Paper-1, RASA SHASTRA, Part A, UNIT -2 परिभाषा प्रकरण

UNIT -2 परिभाषा प्रकरण   

i.आवाप

ii.निर्वाप

iii.ढालन

iv.भावना

v.जारण

vi.मूर्च्छन

vii.शोधन

viii.मारण

ix.अमृतीकरण

x.लोहितिकरण

xi.मृत लोह

xii.सत्व पातन

xiii.द्रुति

xiv.अपुनर्भव

xv.निरुत्थ

xvi.रेखापूर्ण

xvii. वारितर

 

i. आवाप

किसी धातु, उपधातु अथवा खनिज को तीव्राग्नि में पिघलाकर उसके ऊपर किसी भी द्रव्य चूर्ण को छिड़कना या छोड़ना आवाप कहलाता है

पर्याय: प्रतिवाप, आच्छादन

ii. निर्वाप

किसी धातु, उपधातु अथवा रस उपरस आदि को तीव्राग्नि में तपाकर उसे जल, स्वरस, क्वाथ, दुग्ध, तेल, गोमूत्र, घृत आदि द्रवों में बुझाने की क्रिया को निर्वाप कहते हैं

पर्याय: निषेक, स्नपन

iii. ढालन

किसी भी धातु जैसे सोना, चांदी, लोहा, ताम्बा आदि को तीव्राग्नि में पिघलाकर उसे किसी भी द्रव जैसे जल, स्वरस, क्वाथ, दुग्ध, तेल, गोमूत्र, घृत आदि में ढाल देने की क्रिया को ढालन कहते हैं

iv. भावना

किसी भी औषध चूर्ण (धातु भस्म आदि) को निर्दिष्ट द्रव पदार्थ जैसे जल, स्वरस, क्वाथ फांट, दुग्ध, तेल, घृत आदि से पूरित कर खरल में मर्दन कर सुखाने की क्रिया को भावना कहते हैं

  1. v. जारण

पारद में स्वर्ण आदि धातुओं को मिलाकर जीर्ण करा देने की क्रिया को जारण कहते हैं. जीर्ण किये हुए द्रव्यों को छानने, पातन करने, गलाने आदि किसी भी क्रिया से अलग नहीं किया जा सकता.

पर्याय- जारणा, चारण, चारणा

vi. मूर्च्छन

निर्दिष्ट द्रव्यों के साथ पारद को निर्दिष्ट समय तक मर्दन करने की क्रिया को मूर्च्छन संस्कार कहते हैं.

इससे पारद के मल, बन्हि और विष दोष दूर होते हैं.

vii. शोधन

विभिन्न द्रव्यों के दोषों को दूर करने एवं सेवन योग्य बनाने के लिए निर्दिष्ट द्रव्योब के साथ स्वेदन, मर्दन, प्रक्षालन, गालन, आवाप, निर्वाप, भावना और भर्जन आदि क्रियाओं की मदद से दोषमुक्त करना शोधन कहलाता है.

viii. मारण

शोधित द्रव्य जैसे ताम्र, लोह, रत्न आदि का निर्दिष्ट द्रव्यों के साथ मर्दन कर, पिष्टी एवं चक्रिका बनाकर निर्दिष्ट पुट (जैसे- गज पुट, कपोत पुट) में रखकर भस्म बनाना मारण कर्म कहलाता है.

पर्याय- भस्मीकरण

ix. अमृतीकरण

  • अमृतीकरण का शाब्दिक अर्थ अमृत में परिणीत करना या अमृत के सामान गुणवान बनाना, या भस्मों में अमृत सामान गुण की कामना करना.
  • धातुओं के शोधन – मारण के पश्चात/ भस्म बनाने के पश्चात भी उसमें बचे हुए दोषों को दूर करने के लिए जो संस्कार किया जाता है उसे अमृतीकरण कहा जाता है.
  • भस्म से विषाक्त गुणों को दूर करना
  • अभ्रक, स्वर्ण माक्षिक, ताम्र, लौह के भस्मों का किया जाता है

x. लोहितीकरण

  • भस्म निर्माण एवं अमृतीकरण के पश्चात अक्सर भस्म का उत्तम रक्त वर्ण/ लोहित वर्ण प्राप्त नहीं हो पाटा है, उसे फिर से एक क्रिया द्वारा संस्कारित कर उत्तम लोहित वर्ण में परिवर्तित करना ही लोहितीकरण कहलाता है.
  • लोह भस्म, अभ्रक भस्म, स्वर्ण माक्षिक भस्म का लोहितीकरण किया जाता है.

x मृतलौह

-सम्यग् धातु भस्म

धातु की भस्म को अंगुष्ठ और तर्जनी अँगुलियों से रगड़ने से यदि वह धातु भस्म अँगुलियों की सूक्ष्म रेखाओं में घुस जाए एवं पोछने पर भी उसके सूक्ष्म अंश रेखाओं में रह जाए तब उस भस्म को मृतलौह की संज्ञा दी जाती है.

xii. सत्वपातन

-सत्व= धातु सार

-सत्वपातन= धातु सार प्राप्त करने की विधि

किसी भी धातु या उसके खनिज से उत्तम भस्म निर्माणार्थ उस धातु का सत्व/ सार निकालने की क्रिया सत्वपातन कहलाती है.

उदाहरण- अभ्रक सत्वपातन

xiii. द्रुति

विशिष्ट औषधियों के संयोग एवं तीव्राग्नि से जब कोई धातु अथवा खनिज अपनी ठोसावस्था को त्याग कर द्रवीभूत हो जाये एवं सामान्य तापमान पर भी द्रव रूप में बना रहे तब उस अवस्था को उस पदार्थ की द्रुति कहा जाता है.

द्रुति के लक्षण-

१.निलेपत्व (पात्र में न लगना)

२.द्रुतत्व (द्रवरूप में रहना)

३.तेजस्त्व (चमकदार होना)

४.लघुता (मूल पदार्थ से हल्का होना)

५.असंयोगस्च सूतेन- पारद में पूर्णतया नहीं मिलने वाला

         पाठ भेद- संयोगस्च सूतेन- पारद में शीघ्र मिल जाने वाला

xiii. द्रुति

द्रुति के भेद-

१.प्रयोग भेद से-

a.पारद कर्म हेतु / पारद सिद्धि हेतु

b.चिकित्सा कर्म हेतु

२.निर्माणविधि भेद से-

a.गर्भद्रुति – ग्रास द्रव्य को पारद में डालकर द्रुति किया जाता है

b.बाह्य द्रुति – ग्रास द्रव्य को पारद से पृथक द्रुति करने के बाद पारद में ग्रास दिया जाता है (जारण)

३.पदार्थ भेद से-

a.लोह द्रुति

b.रत्न द्रुति

c.गंधक द्रुति

d.अभ्रक द्रुति

xiv. अपुनर्भव

किसी धातु भस्म को मित्रपंचक (गुड, गुंजा, टंकण, मधु और घृत) के साथ मिलाकर धमन करने के उपरान्त यदि उस भस्म में कोई परिवर्तन न हो अर्थात वह अपने मूल धातु में परिवर्तित न हो तो उसे अपुनर्भव भस्म कहते हैं.

– यह उत्तम भस्म का एक प्रमुख लक्षण है.

xv. निरुत्थ

किसी धातु भस्म को रजत के साथ मिलाकर धमन करने के उपरान्त यदि उस भस्म का कोई भी अंश रजत में न मिले अर्थात रजत का वजन न बढे तो उस धातु भस्म को निरुत्थ भस्म कहते हैं.

– यह उत्तम भस्म का एक प्रमुख लक्षण है.

xvi. रेखापूर्ण

किसी धातु भस्म को तर्जनी उंगली और अंगुष्ठ से उठाकर रगड़ा जाए और वह भस्म उँगलियों की रेखाओं में भर जाए तो उसे रेखापूर्ण भस्म कहते हैं.

– यह उत्तम भस्म का एक प्रमुख लक्षण है.

xvii. वारितर

धातुओं की भस्म को अंगुष्ठ और तर्जनी से दबाकर जल में डालने पर यदि वह जल में तैरती रहे तो उस भस्म को वारितर भस्म कहते हैं.

– यह उत्तम भस्म का एक प्रमुख लक्षण है.

 

कृपया विषय को भलीभांति समझने के लिए विडियो जरुर देखें.

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